पंछी बन कहीं उड़ जाऊ में
अम्बर के गलियारों में ,
बस राही बन खो जाऊ में
उड़ने को बेताब सा , इक चितेरे ख्वाब सा
मंजिल की तलाश में , चलता चला जाऊ में
पंखो को फैलाते हुए , कलरव सा चहलाते हुए
इस नीरस जग से ऊपर ,कहीं लहराता हुआ जाऊ में
इक कशिश है ऊपर जाने की , इक आरजू जो निहारने की ,
मदमस्त हो बन , कहीं इठलाता हुआ जाऊ मैं
पंछी बन कहीं उड़ जाऊ मैं ,पंछी बन कहीं उड़ जाऊ मैं |
